नव वर्ष का आलोक
नव वर्ष के आलोक में हम
विगत तम के दर्द भूलें।
अब तक विषाद कष्टों वाले
जो खेले साथ खिलौने
सिहराने तकिया तनाव की
थे,मिले अशांत बिछौने
अब नयन रचें अपने सपने,
अनुराग हिंडोला झूलें।
विविध रूप से भरी जिंदगी
जो रंग बिरंगी देखी
समझ औ संतुलित मिजाज से
वय ने हर अड़चन तय की
कर शबनम मुक्ता से श्रंगार,
कुसुम सुवासित से फूले।
जीवन के पन्नों में अक्षर
कुसुमित फूलों से लिख दें
नव उमंग से अपना आंगन
मधु खुशबू से फिर भर दें
पंख खोलकर मन के पांखी,
मन चाहा अम्बर छूलें।
हम चुप्पियों में कुलबुलाती
चाहतों के बंध खोलें
दिन कंचनी निशि चांदनी को
प्रीति अंजुरी में समोलें
प्रिय आंच वाले शीत ऋतु के,
निमंत्रण मन से कुबुलें।
नव वर्ष के ……….
सत्येन्द्र तिवारी

