राघवेंद्र पांडे की खबर
ख़बरों की दुनिया को अलविदा कह गोपेश पाण्डेय खुद ख़बर बन गए. गोपेश जी मेरे अनन्य मित्र थे. मित्र क्या, हम बनारसी पत्रकार मित्रों की टोली के सबसे बुज़ुर्ग सदस्य थे. 77 में जब हम बीएचयू में दाखिला ले रहे थे, वे ‘आज‘ अखबार में बतौर रिपोर्टर दाखिल हो चुके थे. तब तक जागरण बनारस में आया नहीं था. इकलौता अखबार ‘आज’ था. और उसके सिटी चीफ की बड़ी हनक होती थी. और गोपेश तो खासे सक्रिय व्यक्ति थे. घटना कहीं घटे गोपेश निराकार ब्रह्म की तरह हर कहीं मौजूद रहते थे. यह उनकी रिपोर्टरी सजगता थी.
उनके जाने से मन उदास है. उनके मौत की खबर सुनते ही लगा कि गोपेश पांडे फिर उठ खड़े होंगे. फिर मौत को हरा वे लौटेंगे. दरअसल वे दूसरी बार गए हैं. पहली बार तो आधे रास्ते यमराज को परास्त कर लौट आए थे. यमराज से उनका साक्षात्कार पहले भी हुआ था. इस कहानी में रहस्य और रोमांच दोनों हैं. बात 18 फरवरी 1998 की है. मुलायम सिंह यादव सँभल से चुनाव लड़ रहे थे. सँभल में उनकी चुनावी रैली थी. लखनऊ से ढेर सारे पत्रकार रैली कवर करने गए थे. गोपेश पाण्डेय भी उनमें थे. गोपेश जी को लखनऊ गए कम ही दिन हुए थे. इसलिए तब वहॉं उनकी जान पहचान कम ही थी. रात करीब नौ बजे सीतापुर के पहले खैराबाद में भीषण कार दुर्घटना हुई. तीन लोग इस दुर्घटना में मारे गए. जिनमें तब के ख्यात पत्रकार जयप्रकाश शाही भी थे. लेखक पत्रकार दयानंद पांडेय गम्भीर रूप से ज़ख़्मी हुए. गोपेश की भी हालत नाज़ुक थी. लखनऊ ख़बर पहुंची की गोपेश जी भी नहीं रहे. उस वक्त मैं लखनऊ में था. मौके से जो खबर आ रही थी वह भ्रामक थी. उस हादसे में तीन लोगों के मरने की खबर थी और कई घायल थे. हाल जानने के लिए मेरे पास लगातार गोपेश जी के घर से फ़ोन आ रहे थे. तो कभी राघवेश का फ़ोन उनकी कुशलक्षेम के लिए. मैंने कहा, मैं स्वयं पीजीआई जा रहा हूँ. फिर आपको बताता हूँ. सभी हताहतों को सीतापुर से लखनऊ पीजीआई लाया जा रहा था. मैं दौड़ते-हांफते इमरजेंसी में पहुंचा. वहॉं घायलों में गोपेश नहीं थे. कोई कुछ बताने की स्थिति में नहीं था.
मैंने बारी बारी से सबके चेहरे देखे. गोपेश पांडे अस्पताल के किसी बिस्तर पर नहीं दिखे. मन उदास हो गया. किसी ने कहा, एक बार मोर्चरी यानी शवगृह भी देख लिजिए. वहां पहुंचा तो स्ट्रेचर पर तीन देह थी. शाही जी, ड्राइवर और गोपेश पांडे. मित्रों की देह देख लगा धरती फट जाएगी. मैं यंत्रवत वहीं खड़ा था. तभी देखा कि गोपेश जी के शरीर में कुछ हरकत हुई. मैं चिल्लाया- गोपेश जिंदा हैं. मोर्चरी में लेटे लेटे उनकी सांसें चल रही थीं. दिल धड़क रहा था. पहले तो लगा कि शायद ये मेरा भ्रम है. पर यह पुलिस वालों की करतूत थी. उन्हें मरा समझकर मोर्चरी पहुंचा दिया गया था.
मैंने गोपेश के ज़िंदा होने का शोर मचाया तो लोग भागे भागे आए. उन्हें आपातकालीन चिकित्सा कक्ष में पहुंचाया गया. उनके सिर में गम्भीर चोट थी. छाती की पसलियॉं टूट गई थीं. पॉंव में फैक्चर था. हफ्तों तक वहीं रहे और ठीक v न जाता तो शायद उनको खो देता.
वे ठीक तो हो गए पर इस घटना के वाद उनका आत्मविश्वास और आत्मबल फिर लौटा नहीं. जब मिलते तो रोने लगते- “बचा ले ला गुरू“. मैं कहता हम क्या कर सकते हैं? हम निमित्त मात्र हैं. कर्ता तो कोई और है. आपका वक़्त हुआ नहीं था. चित्रगुप्त ने बेवक्त गलत पर्ची फाड़ दी थी. इन तीस साल में गोपेश जी जब मिले इस किस्से का ज़िक्र जरूर हुआ. परसों जब फिर उनके निधन की खबर मिली, तो एक उम्मीद फिर जगी. शायद फिर ऊपर वाले से कोई गलत पर्ची कट गई होगी. अर्थी से उठकर मेरा मित्र फिर लौटेगा. और कहेगा- बचा लिया गुरु, वरना निपट लिए थे.
गोपेश अक्खड़ थे. लड़ने और अड़ने वाले थे. पत्रकारिता के उसूलों एवं आदर्शों पर सौ फीसद प्रतिबद्ध. एक ही अखबारी घराने में अटूट निष्ठा जताते उन्होंने ताउम्र ‘आज’ अखबार में ही काम किया. किसी और अखबार में वे कभी नहीं गए. 1996 में आज अखबार के प्रबंधन ने उन्हें लखनऊ भेज दिया. लखनऊ में पहले से बैठे मठाधीशों ने उन्हें स्वीकार नहीं किया. वे लखनऊ में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करते रहे. उस दौरान मेरी उनसे निकटता और बढ़ीं. 55 की उम्र में जब ‘आज’ अखबार ने उन्हें जबरन रिटायर किया तो उन्होंने संस्थान से भी लंबी क़ानूनी लड़ाई लड़ी.
हालांकि सिटी चीफ होने की स्मृति ने उनका पीछा कभी छोड़ नहीं. दिनचर्या वही थी. रात जैसे-जैसे गहराती, गोपेश जी चैतन्य होते. बारह बजे फ़ोन पकड़ा तो कब तक गप्प लड़ेगी यह निश्चित नहीं था. दो बजे भोजन, तब विश्राम. एक सक्रिय पत्रकार की जीवनशैली ही उनके जीवन का विधान बन गई थी. वो आज में रहे या समाज में रहे, पत्रकार ही रहे.
गोपेश जी काशी पत्रकार संघ के नब्बे में अध्यक्ष चुने गए. संयोग से यह साल काशी पत्रकार संघ का पचासवां साल था. ’काशी पत्रकार संघ’ देश में श्रमजीवी पत्रकारों का सबसे पुराना 1940 में स्थापित संगठन है. 1940 में काशी पत्रकार संघ के पहले अध्यक्ष पंडित कमलापति त्रिपाठी थे, लेकिन आजादी की लड़ाई लड़ते हुए उनके राजनीतिक बंदी होने पर 1943 में पंडित दिनेश दत्त झा अध्यक्ष चुने गये जो 1946 तक अपने पद पर रहे. काशी पत्रकार संघ की स्वर्ण जयंती पर गोपेश जी के सहयोग से मैंने जनसत्ता में एक पूरा पेज प्लान किया जो काशी पत्रकार संघ की ऐतिहासिक उपलब्धियों और आजादी की लड़ाई में उसके योगदान पर छपा. इसपर समारोह भी हुआ. गोपेश जी इसमें भी मेरे साथ जुटे थे.
बनारस मोक्ष का नगर है. लेकिन गोपेश हमारे लिए बनारस के दरो-दीवार के पत्थर जैसे हैं. जब भी बनारस में किसी इलाके से गुजरूंगा या स्मृतियों में काशी को याद करूंगा, गोपेश कहीं किसी कोने से उठ खड़े होंगे और मुझे एक बार फिर से आवाज़ देंगे, ऐसा भ्रम होता है. दरअसल, जाने वाले लोग जाकर भी आपके भीतर एक कोने में जीवित रहते हैं. वो समय समय पर आपसे बातें भी करते हैं और आपको कुरेदते-गुदगुदाते भी हैं. गोपेश भी मेरी बनारस डायरेक्टरी का एक अमिट नाम हैं.
इस दफा अलविदा, गोपेश जी. गंगा आपको मुक्ति दें.
श्री हेमंत शर्मा जी नईं दिल्ली की फेसबुक वाल से

